थाम लेंगे राहे-हयात मैं, गर तेरे कदम बहक जांयेंगे,
क्या मालूम था इस राह में मेरे सनम बहक जांयेंगे ।
यूँ तो पूजते है प्रेम को सब यंहा,
पर हम चले, तो इल्म न था तेरे मेरे धरम बहक जायेंगे।
इश्क़ है साहब होना था, सो हो गया,
मैं उसमें डूबा और वो मुझमें कंही खो गया।
धर्मों की किताब से क्या वास्ता उसका,
प्रेम सानिध्य का अंकुरित बीज मन में बो गया।
बदसलूकी के मिजाज हुयें हैं दोनों तरफ अब शुरु,
मालूम ना था, धरम के बाशिंदो के करम बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में.........
तेरी उर्दू का तकल्लुफ रास आता था मुझे,
मेरी हिंदी का सत्कार मेरे पास लाता था तुझे।
गंगा जमुना तहजीब के सिरे थे हमारे हाथों में,
मार देना चाहते थे मुझे, और मर जाना था तुझे।
वो जानते है प्रेम को, पर मानते कंहा है,
डर है उन्हें, सदियौ से स्थापित धर्मो के संस्करण बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात.......
आडम्बर के ताने-बाने को फिर इक बार हमपे कसा गया,
बेगैरत के सर्प से कई बार फिर हमको डसा गया।
सुध बुध कंहा थी हमें इश्क़ में, तो फ़ना हो गए,
सुना, बेजान शरीर को कंधो में उठा ठेकेदारों का जलसा गया।
तुम सच में उसको पाना चाहते हो, यह दीखता तो नहीं,
की तुम्हारे इन घृणित क्रत्यो से, उसके अवतरण बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में.....
जो साजिशें की मिलकर तुमने हमें मिटाने की,
काश कोशिश कर लेते दोनों धर्मों को मिलाने की।
प्रेम को मिटा कर, प्रेम तलाशते हो तुम,
आदत नहीं गयी अब भी दुनिया जलाने की।
रख यकीं प्रेम सत्य है, प्रेम शास्वत है,
वो दिन भी आएगा, जब धर्मो के सारे भ्रम बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में..................
जुदा होकर धरती में, देख हम फिर मिल गए,
फूल अपनी चाहतों के हर तरफ खिल गए।
देख अब वंहा चर्चे अपनी मोहब्बत के हैं,
हमारी कब्रों पे पढ़ने को कई फ़ाज़िल गए।
छोड़ चले हैं, जीवन मरण का दामन,
अब ना कदम बहकेंगे, ना अपने चमन बहकेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में.....................
- नवीन गोदियाल
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