माँ शक्ति का इक कुंड, उसका व्याख्यान करूं कैसे,
माँ ममता का अथाह सागर, उसका बखान करूं कैसे।
मुझे रोता देख इक बार तो हंसी होगी,
जब उसके निर्मल हाथों में मेरी कोमल देह सजी होंगी।
जब गोद में लेकर उसने पहला झूला झुलाया होगा,
उसके अंकुरित मन में, नाजाने कितनी शहनाईयां बजी होंगी।
वरना मेरे इक इक आंसू पे, तिल का ताड़ बनाती थी,
और उधेड़बुन में रहती थी,बच्चो के पूरे अरमान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.........
मेरे तोतले पन में, अक्सर वो तोतली हो जाती थी,
अंबर जितना प्यार लूटा, वो खोखली हो जाती थी।
गिरता उठता था तो, कमर उसकी अकड़ जाती होगी,
जब रोता था, खिलौने की वो पोटली हो जाती थी।
उसकी पाठशाला में, पहला शब्द मैं माँ बोला था,
जिसने श्रृष्टि रच दी, उसका शब्दों में गुणगान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.....
वो टोकती थी, और अल्हड़ में, उस मां से भिड़ जाता था,
अपने अधिकारों की बात कर, कई बार उससे लड़ जाता था।
भूल गया उसने अपनी इच्छाओं, अधिकारों को छोड़ दिया,
बस दो कोर निवाले खिलाकर, उसका खून बढ़ जाता था।
मैंने बचपन से लेकर जवानी तक उसपे आघात किए,
वो अंतहीन पीड़ा जो सही उसने, उसका अनुमान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड..........
जाने कैसे, पर मेरे अंतर्मन में, झांक लेती थी माँ,
जो मुझको उलझाती थी, वो उलझन भांप लेती थी माँ।
अपने पति परमेश्वर से लड़कर, मेरे ख्वाब सच करती थी,
पल में मेरे लिए धरती से अंबर नाप देती थी माँ।
उसकी अर्जियां तो भगवान भी खारिज ना कर पाता था,
उस मां की सवेदना का, मैं पापी, अनुष्ठान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.....
तू नहीं है अब, पर हर जगह तू है,
मेरा दर्द तू है, मेरा विरह तू है।
यह जो कमी ढूंढते है ना मुझमें लोग,
मेरा तर्क भी तू है, मेरी जिरह तू है।
ना मंदिर ना भगवान, ना चाहूं मैं काबा काशी,
मेरा भगवान तू है, तेरे चरणों का मैं अभिलाषी।
जिनकी मां है, चल उनसे एक नर्म निवेदन कर ले,
घर जाके हर दिन तू मां का आलिंगन कर ले।
यह इक दिन लिखा संसार ने, पर गलत लिखा,
दिन होगा सफल, हर सुबह उस मां का अभिनंदन कर लेे।
- नवीन गोदियाल
माँ ममता का अथाह सागर, उसका बखान करूं कैसे।
मुझे रोता देख इक बार तो हंसी होगी,
जब उसके निर्मल हाथों में मेरी कोमल देह सजी होंगी।
जब गोद में लेकर उसने पहला झूला झुलाया होगा,
उसके अंकुरित मन में, नाजाने कितनी शहनाईयां बजी होंगी।
वरना मेरे इक इक आंसू पे, तिल का ताड़ बनाती थी,
और उधेड़बुन में रहती थी,बच्चो के पूरे अरमान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.........
मेरे तोतले पन में, अक्सर वो तोतली हो जाती थी,
अंबर जितना प्यार लूटा, वो खोखली हो जाती थी।
गिरता उठता था तो, कमर उसकी अकड़ जाती होगी,
जब रोता था, खिलौने की वो पोटली हो जाती थी।
उसकी पाठशाला में, पहला शब्द मैं माँ बोला था,
जिसने श्रृष्टि रच दी, उसका शब्दों में गुणगान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.....
वो टोकती थी, और अल्हड़ में, उस मां से भिड़ जाता था,
अपने अधिकारों की बात कर, कई बार उससे लड़ जाता था।
भूल गया उसने अपनी इच्छाओं, अधिकारों को छोड़ दिया,
बस दो कोर निवाले खिलाकर, उसका खून बढ़ जाता था।
मैंने बचपन से लेकर जवानी तक उसपे आघात किए,
वो अंतहीन पीड़ा जो सही उसने, उसका अनुमान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड..........
जाने कैसे, पर मेरे अंतर्मन में, झांक लेती थी माँ,
जो मुझको उलझाती थी, वो उलझन भांप लेती थी माँ।
अपने पति परमेश्वर से लड़कर, मेरे ख्वाब सच करती थी,
पल में मेरे लिए धरती से अंबर नाप देती थी माँ।
उसकी अर्जियां तो भगवान भी खारिज ना कर पाता था,
उस मां की सवेदना का, मैं पापी, अनुष्ठान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.....
तू नहीं है अब, पर हर जगह तू है,
मेरा दर्द तू है, मेरा विरह तू है।
यह जो कमी ढूंढते है ना मुझमें लोग,
मेरा तर्क भी तू है, मेरी जिरह तू है।
ना मंदिर ना भगवान, ना चाहूं मैं काबा काशी,
मेरा भगवान तू है, तेरे चरणों का मैं अभिलाषी।
जिनकी मां है, चल उनसे एक नर्म निवेदन कर ले,
घर जाके हर दिन तू मां का आलिंगन कर ले।
यह इक दिन लिखा संसार ने, पर गलत लिखा,
दिन होगा सफल, हर सुबह उस मां का अभिनंदन कर लेे।
- नवीन गोदियाल

