Friday, October 2, 2020

बेटियां कहां बचती हैं

 

निर्भया शर्मशार थे हम तब भी, हम शर्मशार आज भी हैं।

मानवता की हैवानियत पे जाने क्यूं लाचार आज भी हैं।

बेसुध से हम सोएं पड़े हैं, सुध कहां ले पाए हम कभी,

बेटियों पर नृशंसता से होते जघन्य बलात्कार आज भी हैं।

शर्मसार थे तब भी.........

बुलबुल सी चेहकती थी वो, कब उसने यह सोचा होगा।

दर्द भी रोया होगा, जब उन गिद्धों ने उसको नोचा होगा।

उसकी चीखें दब के रह गई उन अमानुषो के हाथो में,

निर्वस्त्र, बेजान बच्ची ने, कैसे अंतहीन दुख भोगा होगा।

कहां बदल पाए घर्णीत समाज के गिरते विचारों को,

बेटियों के खून से लथपथ लिखा समाचार आज भी है।

शर्मशार थे तब भी..........

पूछती है बेटी, कौरव खड़े है, केशव भी तो दिखलाओ,

भीम भी बने कोई और उनकी जांघे जरा उखाड़ लाओ।

परस्त्री के हरण पे, पूरी लंका ढहाने वाले राम कहां है,

पुरखो से मिली न्यायव्यस्था, सोई क्युं है उसे जगाओ।

बाबा इससे तो अच्छा था भूर्ण में ही हत्या कर देते,

तुम्हारे इस अन्नेतिक दुनिया में व्यभिचार आज भी है।

शर्मसार थे तब भी............

देवी जैसे पूजते हो तो बताओ, मेरा वो सम्मान कहां है।

बाबा सबसे पूछो ना, तुम्हारी वो नन्ही सी जान कहां है।

केहदो इनको बेटियों के कभी अभिशाप नहीं लेते,

कैसे जन्म लूं फिर से, सुरक्षित वो मेरा हिंदुस्तान कहां है।

निरुत्तर सा बाप खड़ा असहाय समाज को कोस रहा,

हम गुनहगार तेरे कल भी थे, हम गुनहगार आज भी है।

शर्मसार थे तब भी...........

चरमराती सुरक्षा व्यवस्था, कानून की हालत लचर रही।

सियासत बदली, पर यह दोनों मठाधीश के नए घर रही।

बचाने अस्पताल भी दौड़े, पर वहां भी परछाई इनकी थी,

गुड़िया हाथों में तड़पी थी, वहां खाली मगर बिस्तर रही।

तेरे कुछ अधिकार नहीं है, तू परियों के देश में बस जा,

दरिंदों के लिए कल भी थे और मानवाधिकार आज भी हैं।

शर्मशार थे तब भी............


Sunday, May 10, 2020

"माँ "

माँ शक्ति का इक कुंड, उसका व्याख्यान करूं कैसे,
माँ ममता का अथाह सागर, उसका बखान करूं कैसे।
मुझे रोता देख इक बार तो हंसी होगी,
जब उसके निर्मल हाथों में मेरी कोमल देह सजी होंगी।
जब गोद में लेकर उसने पहला झूला झुलाया होगा,
उसके अंकुरित मन में, नाजाने कितनी शहनाईयां बजी होंगी।
वरना मेरे इक इक आंसू पे, तिल का ताड़ बनाती थी,
और उधेड़बुन में रहती थी,बच्चो के पूरे अरमान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.........
मेरे तोतले पन में, अक्सर वो तोतली हो जाती थी,
अंबर जितना प्यार लूटा, वो खोखली हो जाती थी।
गिरता उठता था तो, कमर उसकी अकड़ जाती होगी,
जब रोता था, खिलौने की वो पोटली हो जाती थी।
उसकी पाठशाला में, पहला शब्द मैं माँ बोला था,
जिसने श्रृष्टि रच दी, उसका शब्दों में गुणगान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.....
वो टोकती थी, और अल्हड़ में, उस मां से भिड़ जाता था,
अपने अधिकारों की बात कर, कई बार उससे लड़ जाता था।
भूल गया उसने अपनी इच्छाओं, अधिकारों को छोड़ दिया,
बस दो कोर निवाले खिलाकर, उसका खून बढ़ जाता था।
मैंने बचपन से लेकर जवानी तक उसपे आघात किए,
वो अंतहीन पीड़ा जो सही उसने, उसका अनुमान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड..........
जाने कैसे, पर मेरे अंतर्मन में, झांक लेती थी माँ,
जो मुझको उलझाती थी, वो उलझन भांप लेती थी माँ।
अपने पति परमेश्वर से लड़कर, मेरे ख्वाब सच करती थी,
पल में मेरे लिए धरती से अंबर नाप देती थी माँ।
उसकी अर्जियां तो भगवान भी खारिज ना कर पाता था,
उस मां की सवेदना का, मैं पापी, अनुष्ठान करूं कैसे।
माँ शक्ति का इक कुंड.....
तू नहीं है अब, पर हर जगह तू है,
मेरा दर्द तू है, मेरा विरह तू है।
यह जो कमी ढूंढते है ना मुझमें लोग,
मेरा तर्क भी तू है, मेरी जिरह तू है।
ना मंदिर ना भगवान, ना चाहूं मैं काबा काशी,
मेरा भगवान तू है, तेरे चरणों का मैं अभिलाषी।
जिनकी मां है, चल उनसे एक नर्म निवेदन कर ले,
घर जाके हर दिन तू मां का आलिंगन कर ले।
यह इक दिन लिखा संसार ने, पर गलत लिखा,
दिन होगा सफल, हर सुबह उस मां का अभिनंदन कर लेे।

- नवीन गोदियाल

ishq

थाम लेंगे राहे-हयात मैं, गर तेरे कदम बहक जांयेंगे,
क्या मालूम था इस राह में मेरे सनम बहक जांयेंगे ।
यूँ तो पूजते है प्रेम को सब यंहा,
पर हम चले, तो इल्म न था तेरे मेरे धरम बहक जायेंगे।
इश्क़ है साहब होना था, सो  हो गया,
मैं उसमें डूबा और वो मुझमें कंही खो गया।
धर्मों की किताब से क्या वास्ता उसका,
प्रेम सानिध्य का अंकुरित बीज मन में बो गया।
बदसलूकी के मिजाज हुयें हैं दोनों तरफ अब शुरु,
मालूम ना था, धरम के बाशिंदो के करम बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में.........
तेरी उर्दू का तकल्लुफ रास आता था मुझे,
मेरी हिंदी का सत्कार मेरे पास लाता था तुझे।
गंगा जमुना तहजीब के सिरे थे हमारे हाथों में,
मार देना चाहते थे मुझे, और मर जाना था तुझे।
वो जानते है प्रेम को, पर मानते कंहा है,
डर है उन्हें, सदियौ से स्थापित धर्मो के संस्करण बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात.......
आडम्बर के ताने-बाने को फिर इक बार हमपे कसा गया,
बेगैरत के सर्प से कई बार फिर हमको डसा गया।
सुध बुध कंहा थी हमें इश्क़ में, तो फ़ना हो गए,
सुना, बेजान शरीर को कंधो में उठा ठेकेदारों का जलसा गया।
तुम सच में उसको पाना चाहते हो, यह दीखता तो नहीं,
की तुम्हारे इन घृणित क्रत्यो से, उसके अवतरण बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में..... 
जो साजिशें की मिलकर तुमने हमें मिटाने की,
काश कोशिश कर लेते दोनों धर्मों को मिलाने की।
प्रेम को मिटा कर, प्रेम तलाशते हो तुम,
आदत नहीं गयी अब भी दुनिया जलाने की।
रख यकीं प्रेम सत्य है, प्रेम शास्वत है,
वो दिन भी आएगा, जब धर्मो के सारे भ्रम बहक जांयेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में..................
जुदा होकर धरती में, देख हम फिर मिल गए,
फूल अपनी चाहतों के हर तरफ खिल गए।
देख अब वंहा चर्चे अपनी मोहब्बत के हैं,
हमारी कब्रों पे पढ़ने को कई फ़ाज़िल गए।
छोड़ चले हैं, जीवन मरण का दामन,
अब ना कदम बहकेंगे, ना अपने चमन बहकेंगे।
थाम लेंगे राहे हयात में.....................

- नवीन गोदियाल